Sunday, May 24, 2020

पैंतीस अखरी

ओंकार सरब प्रकासी।।
आतम मध अर्के अबिनासी।।
इस जीव में भेद न जानो।।
साध चोर सब ब्रम्ह पछाणो।।
हसती चीटी तृण लो आदं।।
एक अखंडत बसै अनाद।।1।।
अ आ ई सा हा ।।

कारण करण अकरता कहीए।।
भान प्रकाश जगत सिऊ लहीए।।
खान पान कछु रूप न रेख।।
निरबिकार अर्द्रेत अलेख।।
गात ग्रास सब देस दिसंतर।।
सति करतार सरब के अंतर।।
धन की निहाई सदा अखंडत।।
ज्ञान बोध परमातम पंडत।।2।।
का खा गा घा ज्ञा।।

चाप ज्ञान तरि जाहि बिराजै।।
छाया र्देत सगला ऊठ बाजै।।
जागृत सुपन सखोपत तरीआ।।
आतम भूपत की ईह पुरीआ।।
झनत फार अनहद घनघोर।।
त्रिकुटी भीतर अति छब जोर।।
ञाणक जोगी ईह रस बाता।।
सोहं सबत अमी रस माता।।3।।
चा छा जा झा ञा।।

टारन ब्रमन अघन की सैना।।
सतिगुरु मुकति पदारथ दैना।।
ढाकत दुबिधा निरमल करण।।
डारि सुधा मुख अपदा हरण।।
ढापक र्देत अंधेरी मन की।।
णासति गुरु भ्रमता सभ तन की।।4।।
टा ठा डा ढा णा।।

तारन गुरु बिना नहीं कोई।।
सृत सिमृति मध बात परोई।।
थान अर्दैत तबी जाई परसै।।
मन बच करम गुरु पग दरसै।।
दारिद रोग मिटे सभ तन का।।
गुरु करणा कर होवै मुकता।।
धनगुरु देव मुकत के दाते।।
नाना नेत बेद जस गाते।।5।।
ता था दा धा ना।।

पारब्रम्ह सभ माहि समाना।।
शांति सिधांत कोओ बखयाना।।
फांस कटी र्दैत गुरु पूरे।।
बाजे शब्द अनाहद तूरे।।
बाणी ब्रम्ह साथ भयो मेला।।
भंग र्दैत हऊ सदा अकेला।।
मान अपमान दोऊ जर गए।।
जोऊ थे सोऊ पुन भए।।6।।
पा फा बा भा मा।।

या किरिआ कऊ सोऊ पछानै।।
अर्दैत अखंड आप कऊ मानै।।
रवि रहै सभमहि पुरख अलंख।।
गइ मिट्टी आतम दरसाना।।
प्रगटे ज्ञान जोत तब भाना।।
लिवलीन भऐ आतम मध ऐसे।।
जिऊ जल जलहि भेद कहु कैसे।।
वासदेव बिन अवर न कोऊ।।
नानक ओ ओम सोहं आतम सोऊ।।7।।
या रा ला वा ड़।।